न केवल इतिहास ऑफ़ भोजपुरिहा भरा पड़ा है संघर्ष करने वालों से बल्कि,साहित्य में भी उनकी बगावत दिखती है, उनकी अलग छवि दिखती है। संत तुलसीदास ने संस्कृत छोड़कर अवधी में लिखा, उनका बहुत विरोध हुआ।संत रविदास(बनारस) में रहे तो उनका भी विरोध हुआ पर उन्होंने हार नहीं मानी। जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने माँ सीता को राजमहल से निकाल जंगल में भेज दिया तो उनको,यानी जगत माता को महर्षि बाल्मीकि (चम्पारण्य,चंपारण बिहार) ने अपने आश्रम में रखा, वो जगह अब सीतामढ़ी भी कही जाती है। संत गुरु गोरखनाथ ने तो अंग्रेजो के समय अलख निरंजन का ऐसा नारा दिया कि सारे देश के संत यही भाषा बोलने लगे। उन्होंने दाल रोटी,चावल सब्जी की जगह खिचड़ी का ही आविष्कार कर दिया… का मजेदार चीज़ है..खिचड़ी के चार यार,चोखा,चटनी,घी ,आचार...
(क्रमशः)
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